चंदेरी युद्ध || एक विद्रोही की विजय

ghanshyam kumawat
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चंदेरी युद्ध || एक विद्रोही की विजय

चंदेरी युद्ध || एक विद्रोही की विजय

भारतीय इतिहास के कुछ पन्ने रक्त से रंजित हैं, जिनके विवरण रोंगटे खड़े कर देते हैं। आक्रांताओं के अहंकार ने लाशों के ढेर लगा दिए और अट्टाहस किया। इतिहास की पुस्तकों में ऐसी ही एक घटना का विवरण मध्यप्रदेश के चंदेरी शहर से मिलता है, जहां आज पूरे विश्व में अपनी साड़ियों की शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध है। उन दिनों चंदेरी वस्त्र निर्माण और व्यापार का एक बड़ा केंद्र था।

इस ब्लॉग में हमने चंदेरी के ऐतिहासिक इवेंट के बारे में जानकारी दी है जो भारतीय इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से को दर्शाती है। चंदेरी युद्ध घटना महिलाओं के साहस और वीरता का प्रतीक है। इसे समझने और सम्मान करने से हमारी समाज में समानता और समरसता की भावना विकसित हो सकती है।

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बाबर का चंदेरी अभियान

चंदेरी का यह विध्वंस मुगल हमलावर बाबर ने किया था। बाबर ने चंदेरी में केवल विध्वंस ही नहीं किया था, बल्कि जिन सैनिकों और नागरिकों को जान बचाने का आश्वासन देकर समर्पण कराया था, उन सभी बंदियों के सिर काटकर एक ऊंचा पहाड़ बना दिया था और उस पर अपनी जीत का झंडा फहराया था। निर्दोष पुरुषों और महिलाओं को पकड़कर गुलाम बनाया गया, उन पर अत्याचार किए गए, और कुछ को खुरासान में गुलामों के बाजार में बेचने के लिए भेजा गया था। इसी चंदेरी युद्ध के बीच, चंदेरी की महारानी मणिमाला सहित 1,500 क्षत्राणियों ने जौहर कर लिया था।

 खानवा का युद्ध और बाबर का चंदेरी अभियान

चंदेरी युद्ध जनवरी 1528 के अंतिम सप्ताह में हुआ था। गद्दार द्वारा चंदेरी दरवाजा खोलने की तिथि 28 और 29 जनवरी की रात है। उस रात भर वीरों का खून बहा और स्त्रियों की चिताएं जलीं। इसलिए कुछ इतिहासकारों ने विध्वंस की तिथि 28 जनवरी मानी है, जबकि कुछ ने 29 जनवरी 1528 को मानते हैं।

उस समय चंदेरी पर प्रतिहार वंशीय शासक मेदनीराय का शासन था। चंदेरी अंतरराष्ट्रीय रेशम के व्यापार का एक बड़ा केंद्र था। मेदिनीराय न केवल चितौड़ के शासक राणा सांगा की कमान में बाबर से युद्ध करने के लिए खानवा के मैदान में अपनी सेना लेकर गए थे, बल्कि राणा सांगा उन्हें अपना पुत्र भी मानते थे।

दुर्भाग्य से खानवा के युद्ध में राणा की पराजय हुई। चंदेरी युद्ध में राणा की हार के दो कारण रहे – एक तो गद्दारी और दूसरा बाबर ने अपने तोपखाने के आगे गायों को बांधकर खड़ा कर दिया था। गायों को सामने देखकर राणा का तोपखाना रुक गया। बाबर का तोपखाना चालू हो गया, और युद्ध का नक्शा ही बदल गया।

राणा के घायल होकर निकल जाने के बाद, बाबर ने अपनी जीत का जश्न मनाया और उन सभी राजपूत राजाओं के दमन का सिलसिला शुरू किया, जो राणा सांगा की कमान में बाबर से युद्ध करने खानवा पहुंचे थे। इनमें मेदिनीराय भी प्रमुख थे। खानवा युद्ध के बाद, मेदिनीराय चंदेरी लौट आए और राणा के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करने लगे।

बाबर का चंदेरी पहुंचना और घेरा

चंदेरी अभियान के लिए बाबर 9 दिसंबर 1527 को सीकरी से रवाना हुआ। इसकी खबर मेदिनीराय को लग गई थी। उन्होंने मालवा के अन्य राजाओं से सहायता मांगी और आवश्यक सामग्री एकत्र करके स्वयं को किले में सुरक्षित कर लिया। चंदेरी का यह किला पहाड़ी पर बना था और देश के सबसे सुरक्षित किलों में से एक माना जाता था।

बाबर और उसकी फौज रास्ते भर लूट, हत्या और बलात्कार करती हुई 20 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुंची। बाबर ने रामनगर तालाब के पास अपना कैंप लगाया और शेख गुरेन और अरयास पठान को राजा मेदिनीराय के पास तीन संदेश भेजे:

1. मुगलों की आधीनता स्वीकार करो और मुगलों के सूबेदार बनो।
2. चंदेरी का किला खाली कर दो, इसके बदले कोई दूसरा किला ले लो।
3. अपनी दोनों बेटियों की शादी मुगल शहजादों से करो।

स्वाभिमानी मेदिनीराय ने इन शर्तों को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि बाबर की फौज पहाड़ी पर नहीं चढ़ पाएगी। लेकिन बाबर के पास तोपखाना और बारूद का पर्याप्त भंडार था। उसने एक रात में ही पहाड़ी को काटकर रास्ता बना लिया और किले के दरवाजे तक पहुंच गया। दूसरी तरफ, राजपूतों के पास न बारूद था, न तोपखाना। उनके पास केवल तीर-कमान, तलवार, भाला या आग के गोले थे।

चंदेरी किले पर हमला और चंदेरी युद्ध

26 जनवरी 1528 को बाबर ने समर्पण के लिए अपना अंतिम संदेश राजा मेदिनीराय को भेजा। संदेश पाकर राजा ने रणभेरी बजाने का आदेश दिया। 27 जनवरी को किले का द्वार खोलकर युद्ध शुरू हुआ, लेकिन तोपखाने के सामने राजपूत सेना टिक नहीं सकी। युद्ध एक प्रहर भी नहीं चल पाया। चूंकि बाहर मजबूत घेराबंदी थी, राजा घायल हो गए और उन्हें अचेत अवस्था में किले के भीतर ले जाया गया। द्वार बंद कर दिया गया।

28 जनवरी को दिन भर बाबर का तोपखाना चंदेरी किले की दीवारों पर गरजता रहा। दीवार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। महारानी मणिमाला को भविष्य का अंदाजा हो गया, और वे किले के भीतर विराजे महाशिव के मंदिर में चली गईं। उनके साथ राज परिवार और अन्य 1,500 से अधिक क्षत्राणियां थीं। सभी सती स्त्रियों ने पहले शिव पूजन किया, फिर स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।

जौहर और चंदेरी युद्ध का अंत

जिस समय ये देवियां जौहर कर रही थीं, तभी किसी विश्वासघाती ने किले का दरवाजा खोल दिया। मुगलों की फौज भीतर आ गई। किले के भीतर यूं भी मातम जैसा माहौल था। जिसके हाथ में जो आया, उससे मुकाबला करने लगा, लेकिन चंदेरी युद्ध नाममात्र का रहा। रात भर मारकाट हुई। यह मारकाट एकतरफा थी। हमलावरों ने किले के भीतर किसी पुरुष को जीवित नहीं छोड़ा। स्त्रियों को बंदी बना लिया गया।

सुबह सारी लाशें एकत्र की गईं। उनके सिर काटे गए और काटे हुए सिरों का एक ढेर लगाया गया। उस पर मुगलों का ध्वज फहराया गया। बाबर चंदेरी में पंद्रह दिन रहा। किले में खजाना खोजा गया। आसपास जहां तक बन पड़ा, लूटपाट की गई। लाशों के ढेर किले और नगर में ही नहीं, गांवों में भी लगे। मकानों को ध्वस्त किया गया। यातनाएं देकर छुपा धन वसूला गया। और अय्यूब खान को चंदेरी का सूबेदार बनाकर बाबर लौट गया।

निष्कर्ष

चंदेरी का विध्वंस भारतीय इतिहास की एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसमें निरपराध नागरिकों और सैनिकों का नरसंहार किया गया। महारानी मणिमाला और 1,500 क्षत्राणियों के जौहर की स्मृतियां आज भी मौजूद हैं। यह घटना हमें याद दिलाती है कि आक्रमणकारियों के अहंकार और क्रूरता ने कितना विनाश किया। हमें इतिहास से सीख लेनी चाहिए और शांति और समानता के लिए कार्य करना चाहिए।

 

 

mardani kiran devi 

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