History of Indraprastha-Delhi

 Indraprastha-Delhi || पांडवों की नगरी

इंद्रप्रस्थ का नाम सुनते ही महाभारत का स्मरण आ जाता है।महाभारत समय के इंद्रप्रस्थ के महलों का सुंदर चित्रण हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।

इंद्रप्रस्थ नगरी को पांडवों ने बताया था तथा इंद्रप्रस्थ को ही पांडवों ने अपनी राजधानी बनाया था। इंद्रप्रस्थ का निर्माण खांडव वन की जगह पर हुआ था ।

पांडवों ने खांडव वन को हटाकर देव शिल्पी विश्वकर्मा की सहायता से इंद्रप्रस्थ-Indraprastha-Delhi का निर्माण किया था।

इंद्रप्रस्थ वैभव की दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका तथा मथुरा के बराबर का था।

History of Indraprastha-Delhi
History of Indraprastha-Delhi

Indraprastha-Delhi -इंद्रप्रस्थ की स्थापना

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र मोह में पांडवों के साथ अन्याय करते हुए हस्तिनापुर को दो भागों में बांट दिया।

आधा भाग अपने पुत्र दुर्योधन को तथा आधा भाग पांडवों को दे दिया। जिसमें दुर्योधन को हस्तिनापुर तथा पांडवों के समय खांडवप्रस्थ को दिया गया।

पांडवों ने अपनी मेहनत से खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ-indraprastha-delhi में तब्दील कर अपनी राजधानी बनाया।

इंद्रप्रस्थ से दुर्योधन की राजधानी हस्तिनापुर लगभग 45 मील दूर थी। इंद्रप्रस्थ को कौरवों की राजधानी के स्थान पर बसाया गया था।

धृतराष्ट्र ने पांडवों को आधा राज्य देते समय उन्हें गौरव के प्राचीन नगर व राष्ट्र खांडवप्रस्थ को विधिवत करके चारों वर्णों के सहयोग से नई राजधानी बनाने का आदेश दिया।

तभी पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण सहित खांडवप्रस्थ पहुंच कर देवराज इंद्र कथा देव शिल्पी विश्वकर्मा की सहायता से इंद्रप्रस्थ नामक नगर का निर्माण करवाया।

इस नगर के चारों और समुद्र की भांति जल से पूर्ण खाइया बनी हुई थी , जो उस नगर की शोभा बढ़ाती थी।

श्वेत बादलों तथा चंद्रमा के समान उज्जवल परकोटा नगर के चारों और खींचा हुआ था। इसकी सुंदरता देखते ही बनती थी।

भगवान श्री कृष्ण के कहने पर दानव राज मय ने इंद्रप्रस्थ में अपनी माया का जाल बिछा रखा था जो देखते ही बनती थी।

नगर की दीवारें मोती माणिक्य से ढकी हुई थी। जगह जगह पर नक्काशी तथा हीरो पन्नों का प्रयोग किया गया था।

Indraprastha-Delhi नगर का स्थापत्य

indraprastha-delhi-इंद्रप्रस्थ स्थापत्य कला का सबसे बेहतरीन उदाहरण था।

महाभारत के अनुसार दानव राज मय ने 14 महीनों तक परिश्रम कर यहां पर विचित्र लंबी चौड़ी सभा का निर्माण किया था जिसमें दुर्योधन को जल में स्थल का स्थल में जल का भ्रम हुआ था।

राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का विधान इसी नगर में किया था।

ऐसी समृद्ध नगरी पर पांडवों को गर्व तथा प्रेम का होना स्वाभाविक था इसलिए उन लोगों ने दुर्योधन से अपने लिए जिन 5 गांव को मांगा था।

उन्हें इंद्रप्रस्थ ही प्रमहाभारत में खांडवप्रस्थ का विवरण दिया है, की कैसे या नगर बसाया बनाया।

पांडवों ने श्री कृष्ण के साथ मय दानव की सहायता से इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था।

 Indraprastha-Delhi || पांडवों की नगरी
Indraprastha-Delhi || पांडवों की नगरी

इस नगर की सुरक्षा के लिए नगर में शस्त्रागार, अभ्यास के लिए मैदान हाउस नगर की परकोटे पर सैनिक तथा तोफे तैनात रहती थी।

इस नगर में कई तरह के फूल तथा फल के बाद लगे हुए थे। इस नगर का खजाना कुबेर के खजाने से कम नहीं था। यह नगर हर तरह से समृद्ध और सुखी  नगर था।

जब इस नगर का निर्माण हुआ तब बड़ी संख्या में विद्वान और कलाकार आए जिनके पास सभी वेद शास्त्र इत्यादि थे वह सभी भाषाओं में पारंगत थे।

यहां पर दसों दिशाओं से राजा महाराजाओं का आगमन हुआ था। इंद्रप्रस्थ-indraprastha-delhi अपनी विलक्षण शोभा के द्वारा अमरावती की छठा का स्मरण करा रहा था।

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ इंद्रप्रस्थ नहीं किया था। महाभारत युद्ध के पश्चात इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर दोनों ही नगरों पर युधिष्ठिर का शासन स्थापित हो गया था।

हस्तिनापुर के गंगा की बाढ़ के साथ वह जाने के बाद 900 ईसा पूर्व के लगभग जब पांडवों के वंशज और सभी चले गए तो इंद्रप्रस्थ का महत्त्व प्राय समाप्त हो गया।

वर्तमान इंद्रप्रस्थ का अस्तित्व – Indraprastha-Delhi ka vartmaan astitva

इंद्रप्रस्थ का वर्तमान समय में नाम बदलकर दिल्ली रखा गया है। आजकल नई दिल्ली में जहां पांडवों का पुराना किला स्थित है, उसी स्थान के परवर्ती प्रदेश में इंद्रप्रस्थ नगर की स्थिति मानी जाती हैं।

पुराने किले के भीतर कई स्थानों का संबंध पांडवों से बताया जाता है। दिल्ली का सबसे प्राचीन भाग यही है। जिस पौराणिक नगरी की मिट्टी ने दिल्ली के पुराने किले की न्यू को थाम रखा है उसका इतिहास महाभारत काल से प्रारंभ होता है।

खांडवप्रस्थ कि जिस उजाड़ बंजर और दुर्लभ भूमि पर पांडवों ने स्वर्ग के समान अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ-Indraprastha-Delhi को बसया था उसी स्थान पर आज यह किला खड़ा है।

कहने का अर्थ है कि इस किले की मिट्टी आज भी पांडवों के समक्ष गवाही देती हैं और वह भी अकेले में विभिन्न स्थानों पर यह है की यहां खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर पांडवों की राजधानी के समय की गवाही देती हैं।

साक्ष्यों के साथ पुराने किले के विभिन्न स्थानों पर यह वाक्य लिखे हैं कि यहां खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर पुरातत्व विधियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि पांडवों की राजधानी उसी स्थान पर थी।

खुदाई में ऐसे बर्तनों के अवशेष मिले हैं जो महाभारत से जुड़े हैं अन्य स्थानों पर भी मिले हैं ।इसके अलावा महाभारत से जुड़े प्रसंग प्राचीन परंपराएं भी इसी ओर संकेत करती है कि पांडवों की राजधानी इसी स्थान पर थी।

दिल्ली और इंद्रप्रस्थ

दिल्ली के निकट इंद्रपत नामक ग्राम भी अभी तक इंद्रप्रस्थ-Indraprastha-Delhi की स्मृति के अवशेष के रूप में स्थित है।

इस बारे में एक सबसे बड़ा तथ्य यह है कि इंद्रप्रस्थ के बाद इंद्रपत नाम का एक गांव 1913 तक था। राजधानी नई दिल्ली का निर्माण करने के दौरान से भी हटा दिया गया था।

नई दिल्ली के रायसेन क्षेत्र में सर्व नाम का एक गांव है जहां से 1327 ईसवी का संस्कृत भाषा का एक अभिलेख प्राप्त हुआ । यह अभिलेख लाल किले के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

अभिलेख में इंद्रप्रस्थ का उल्लेख है यानी हुमायूं से पहले तक इंद्रप्रस्थ एक बड़ा नगर था जिसके अंतर्गत कई गांव आते थे ।

महाभारत के अनुसार गुरु देश की राजधानी हस्तिनापुर थी । पांडवों और उनके चचेरे भाई कौरवों के बीच संबंध बिगड़ गए तो कौरवों के पिता धृतराष्ट्र ने पांडवों को यमुना के किनारे खांडवप्रस्थ का क्षेत्र दे दिया।

इंद्रप्रस्थ नगर यही पुराने किले के स्थान पर बसा हुआ था पुराने किले का इंद्रप्रस्थ वही महाभारत का इंद्रप्रस्थ है।

संभवत खांडव वन की स्थिति वर्तमान मेरठ के निकटवर्ती क्षेत्र में थी। जान पड़ता है कि वास्तव में खांडव वन दिल्ली के इंद्रप्रस्थ नामक स्थान के निकट रहा होगा,क्योंकि पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ-Indraprastha-Delhi इसी वन को जला डालने पर जो सच विभाग प्राप्त हुआ उसी में बनाई गई थी ।

खांडवप्रस्थ, हस्तिनापुर के पास एक प्राचीन नगर था जहां महाभारत काल के पूर्व आयुष, नहुष तथा ययाति की राजधानी थी।

इस नगर की स्थिति दिल्ली से 2 मील दक्षिण की ओर उस स्थान पर थी जहां आज हुमायूं द्वारा बनवाया पुराना किला खड़ा है। ऐसी प्रबल मान्यता है कि पांडवो की राजधानी इंद्रप्रस्थ ही वर्तमान की दिल्ली का पुराना किला है।

दिल्ली का महाभारत काल से संबंध

दिल्ली और उसका अंचल” बताती है कि सन् 1955 में पुराने किले के दक्षिणी-पूर्वी भाग में परीक्षण के तौर पर प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बीबी लाल द्वारा खोदी गई कुछ खाइयों में बाद के कुछ स्मृतिचिन्ह और अवशेषों के अलावा चित्रित भूरे रंग के बर्तनों के टुकड़े निकले।

चूँकि ऐसे लक्षणों वाले बर्तन महाभारत की कहानी से सम्बद्व अनेक स्थलों पर पहले भी पाये गए थे और इनका काल 1500 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया था, इनके यहां से प्राप्त होने से महाभारत के प्रसिद्व पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ का पुराने किले के स्थल पर होने को बल मिला।

बीबी लाल के नेतृत्व में पुनः 1969- 70 में दोबारा खुदाई शुरु हुआ लेकिन पूरा नहीं हो पाया। 65 वर्ष बाद भी किले का सिर्फ 5 प्रतिशत भाग का ही परीक्षण और खुदाई हुआ है।

इंद्रप्रस्थ-Indraprastha-Delhi में खुदाई में जो पीजीडब्ल्यू मिला वही हस्तिनापुर में भी मिला। पुराना किला के मुख्य प्रवेश द्वार से घुसते ही दाहिनी तरफ एक पुरातत्वीय संग्रहालय भी है।

यहां पर भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण की ओर से पुराना किला में किए उत्खनन कार्य (1955 में और फिर दोबारा 1969-1973 तक) मिली वस्तुएं प्रदर्शित है।

Indraprastha-Delhi

इंद्रप्रस्थ-Indraprastha-Delhi  का उल्लेख पाली रूप के तहत, इंदपट्ट, बौद्ध ग्रंथों में भी कुरु महाजनपद की राजधानी के रूप में उल्लेख किया गया है।

जहां इसे यमुना नदी पर स्थित कुरु साम्राज्य की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है। बौद्ध साहित्य में हथिनीपुरा (हस्तिनापुर) और कुरु साम्राज्य के कई छोटे शहरों और गांवों का भी उल्लेख है।

इंद्रप्रस्थ ग्रीको-रोमन दुनिया के लिए भी जाना जाता हो सकता है: इसका उल्लेख टॉलेमी के भूगोल में दूसरी शताब्दी सीई से “इन्दबारा” शहर के रूप में किया गया है, जो संभवतः प्राकृत रूप “इंडबट” से लिया गया है, और जो दिल्ली के आसपास के क्षेत्र था।

वर्तमान में भी किले के चारों तरफ़ एक गहरी खंदक है, जिसे युद्ध के समय यमुना नदी के पानी से भर दिया जाता था।  आज कल इस खंदक का प्रयोग पर्यटकों के लिए बोटिंग करने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है।

Indraprastha-Delhi facts

इंद्रप्रस्थ का नया नाम क्या है?

महाभारत में जिस इंद्रप्रस्थ और खांडवप्रस्थ का जिक्र किया गया है वह वर्तमान में भारत की राजधानी दिल्ली है।

इंद्रप्रस्थ का नाम कैसे पड़ा?

इंद्रप्रस्थ का नाम भगवान इंद्र पर रखा गया क्योंकि इस नगर को भगवान इंद्र के स्वर्ग के समान बसाया गया था।

Indraprastha के अंतिम राजा कौन थे?

इंद्रप्रस्थ के अंतिम आर्य राजा निचक्षु था।

पांडवों ने इंद्रप्रस्थ-indraprastha-delhi में कितने वर्ष शासन किया?

पांडवों ने अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ में कुल 36 वर्ष तक राज्य किया था।

युधिष्ठिर के बाद हस्तिनापुर के राजा कौन था?

महाराज युधिष्ठिर के पश्चात हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी के रूप में भीमसेन को चुना गया था।

महाभारत का युद्ध कितने दिवस तक चला था?

महाभारत का युद्ध कुल 18 दिवस तक चला था।

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