पांडवों की अंतिम यात्रा || महाभारत

पांडवों की अंतिम यात्रा || महाभारत

महाभारत का युद्ध और विजय के बाद पांडवों की उनकी अंतिम यात्रा उनके जीवन में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इस यात्रा के दौरान घटी अनेक रोचक घटनाएं और उनके विभिन्न व्याख्यान। इस लेख में, हम इस यात्रा के घटित होने वाले प्रमुख अंशों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

पांडवों की अंतिम यात्रा || महाभारत
पांडवों की अंतिम यात्रा || महाभारत

पांडवों की जीत और हस्तिनापुर पर राज्याभिषेक:

महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय के बाद, उन्होंने हस्तिनापुर पर राज किया। इस अवधि में अनेक घटनाएं हुईं, जिनमें भयानक अपशकुन घटित हुए। इस दौरान भगवान कृष्ण, गानधारी के द्वारा और शाम्ब को विश्यों से मिले श्राप के कारण यदुवंशी आपस में लड़कर समाप्त हो गए।

द्रोपदी सहित पांडवों की स्वर्ग यात्रा:

इसके बाद पांडव वद्रोपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग की यात्रा करने का निर्णय लिया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक तीर्थों, नदियों और समुद्रों की यात्रा की।

यात्रा के दौरान घटी घटनाएं और उनका व्याख्यान:

यात्रा के समय भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, और युधिष्ठिर ने अनेक परीक्षाओं से गुजरना पड़ा। यहां उनकी परीक्षाओं और गिरने के पीछे छुपी व्याख्याओं को विस्तार से जानकारी दी जाएगी।

पांडवों की स्वर्ग यात्रा:

पांडवों की जीत के बाद, वे स्वर्ग की यात्रा करने निकले। स्वर्ग पहुंचकर, युधिष्ठिर ने दुर्योधन को दिव्य सिंहासन पर बैठा हुआ पाया, जबकि उनके भाइयों और द्रोपदी का कोई पता नहीं था। उन्हें यह देखकर चिंता हुई और उन्होंने देवताओं से वहाँ जाने की इच्छा व्यक्त की।

युधिष्ठिर के दिव्य दर्शन:

देवताओं ने युधिष्ठिर को दिव्य दूत के साथ भाईयों के पास ले जाने का वादा किया। दिव्य दूत ने उन्हें एक दुर्गम स्थान तक पहुँचाया, जहाँ अंधकार और दुर्गंध थी। यहाँ उन्हें और आगे बढ़ने का सलाह दिया गया।

युधिष्ठिर ने ये जानने के लिए पूछा कि वे आगे कितना दूर जाना है और उनके भाई कहां हैं। देवदूत ने जवाब दिया कि जब तक आप ठक नहीं जाते, तब तक चलते रहें। युधिष्ठिर ने अपने भाईयों की तलाश में आगे बढ़ते हुए एक गंभीर आवाज सुनी, जो उन्हें रुकने के लिए कह रही थी। इसे सुनकर उन्होंने देवदूत के परचम से वद्ध्रोपदी का परिचय लिया। फिर वे देवताओं के पास चले गए।

देवताओं की आमंत्रण पर, युधिष्ठिर ने देवी गंगा में स्नान किया और मानव शरीर छोड़कर दिव्य शरीर धारण किया। उन्हें महर्षियों ने स्तुति की और फिर उन्हें उनके भाइयों के पास ले गए, जो उन्हें प्रसन्नता से स्वागत कर रहे थे।

युधिष्ठिर को स्वागत के बाद, वे श्री कृष्ण, अर्जुन, और अन्य देवताओं से मिले, जिन्होंने उन्हें दिव्य रूप में देखा।

समापन:

महाभारत के पांडवों की इस दिव्य यात्रा ने उन्हें अनुभवों से भरपूर दर्शन प्राप्त किए। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने अपने भाईयों का साथ पाया और दिव्य दर्शनों का आनंद लिया।

संक्षेप:

अंत में, पांडवों की यात्रा स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर पहुंचने के बाद, उनके साथ उनका परमभक्त कुत्ता भी था, जिससे धर्मराज यमराज बहुत प्रसन्न हुए।

निष्कर्ष:

यह लेख महाभारत के महत्त्वपूर्ण पर्व की उत्कृष्टता को दर्शाता है, जो पांडवों के जीवन के एक महत्त्वपूर्ण संघर्ष को दर्शाता है। इसमें उनकी अंतिम यात्रा की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को बेहतरीन तरीके से समझाया गया है

 

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